Shri Mali Ji pravachan on navratra

नवरात्र के अंतिम दिन इसलिए होते हैं खास

नवरात्रि के नौ दिन इस ब्रह्मांड में आनंदित रहने का एक अवसर है। ब्रह्मांड तीन मौलिक गुणों सत, रज और तम से बना है। हमारा जीवन भी इन्हीं गुणों से संचालित है। कहीं न कहीं हमारे जीवन में इनका समावेश है। अगर देखें तो नवरात्रि के पहले तीन दिन तमोगुण के लिए हैं। दूसरे तीन दिन रजो गुण के और आखिरी तीन दिन सत्व गुण के लिए हैं। हमारी चेतना इन तमोगुण और रजोगुण के बीच बहती हुई सतोगुण के आखिरी तीन दिन में खिल उठती है।

navratra

नवरात्र की यह यात्रा हमारे बुरे कर्मों को खत्म करने के लिए है। यही वह उत्सव है, जिसके द्वारा महिषासुर(जड़ता) शुंभ-निशुंभ ( गर्व और शर्म) और मधु कैटभ(अत्यधिक राग द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है। वे एक दूसरे के पूर्णतः विपरीत है। फिर भी एक एक दूसरे के पूरक हैं। जड़ता, नकारात्मकता और मनोविकृतियां रक्तबीजासुर की तरह है। कुतर्क वितर्क और धुंधली दृष्टि को केवल प्राण और जीवन शक्ति ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है।

नवरात्रि का त्यौहार इसके लिए अवसर देता है। आपके अंदर ऊर्जा का संचार करता है। इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है। लेकिन उनके बीच अलगाव की भावना महसूस होना ही द्वंद का कारण है। एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवंत है। देवी मां या शुद्ध चेतना ही सब नाम और रूप में व्याप्त है। हर नाम और हर रूप में एक ही देवत्व को जानना ही नवरात्रि है।

आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के जरिए जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है। काली मां प्रकृति की सबसे भयानक अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है। फिर भी उसका एक भयानक रूप भी है। इस द्वैत यथार्थ को मानकर मन में एक स्वीकृति आ जाती है।

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