‘रोना बंद करें’ अपना भाग्य स्वयं लिखें

सामन्यता मनुष्य भाग्य को कोसते रहते हैं ,कि मेरा भाग्य अच्छा नहीं ,स्वयं को छोटा समझना कायरता है।

स्वयं को बड़ा बनाना है तो ,अपने भाग्य का रोना बंद करना होगा। कोई भी मनुष्य छोटा या बड़ा नहीं जन्मता एक सा जन्मता है ,एक सा मरता है। कोई भी मनुष्य कर्म से ही महान होता है। जितनी भी महान हस्तियाँ हुई हैं। वे अपने कर्मो के कारण ही महान हुई हैं ।  जैसे गांधीजी ,मदर टेरेसा ,स्वामी विवाकानंद ,आदि।

गाँधी जी के विचार थे , “सादा जीवन उच्च विचार” । मदर टेरेसा अपने पास रखती थी एक थाली और  एक  लौटा ।ऐसी कई महान हस्तियाँ हुई जो अपने निस्वार्थ कर्मो के कारण महान हुई । उनके पास थी आत्म – बल की शक्ति।
अतः रोना बंद करो ! जीवन को उन्नत बनाने के लिए समर्पित कर्म करो ,जिसमे कर्तापन का अहंकार न हो। ऐसा कर्म करे जिसमे सेवा व् धर्म हो। कुछ हमारी मानसिकता कुछ हमारे आस पास का वातावरण हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जैसे परिवेश मे  हम रहते हैं ,स्वयं को वैसा ही समझने लगते हैं। राजा का बेटा स्वयं को राजा, शुद्र का बेटा स्वयं को शुद्रएवम्  किसान का बेटा स्वयं को किसान समझने लगता है।  वास्तव राजा, किसान ,शुद्र यह सब तो कर्म के एक प्रकार हैं जिस मनुष्य को जो कर्म मिलता है ,वह करने लगता है।

यह तो हमारी मानसिकता है ,जो हमें छोटा या बड़ा बनाती हैं।  सूरज सबको एक समान रोशनी देता है,नदियाँ सबको एक सा जल देती हैं । जीवन को उन्नत बनाने के लिए कर्म अति आवयशक है । कहते है न  “कर्म बिना न मिले भिक्षु को रोटी द्वार -द्वार पर चिल्लाए न जो ज़ोर -जोर की” ।

धन -दौलत तो जीवको – पार्जन का एक साधन है ,हमारी पहचान नहीं। सबसे बड़ी है आत्मा की शक्ति या आत्मबल जो हमें शुभ कर्म करने से मिलता  है ।  हमें अपने जीवन चरित्र को महा- पुरषों के जीवन चरित्रों से सींचते रहना चहिये ,जो हमारा आत्म -बल बड़ा जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

सबसे बड़ा धन है संतोष ,मेरा तो हर प्राणी से यही सन्देश है ,की  “भाग्य का रोना बंद करे”  ,संतोष का धन अपनाये ,शुद्ध कर्मों की दीवार बनाए ,स्वयं का जीवन बनाए जैसे सूर्य , सरिताएँ  और  वृक्ष !!!

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