महापुरूष अतुलनीय होते हैं

गांधीजी और शास्त्रीजी जयंती- एक साथ दोनों महापुरूषों को प्रणाम करने का, उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को स्मरण करने का सुअवसर है। समाचार पत्रों व सतत् गतिशील सोशल मीडिया पर भी इनके व्यक्तित्व पर काफी सामग्री है। त्वरित मीडिया फेसबुक पर कुछ विचित्र वातावरण बना हुआ है, फेसबुक के बुद्धिजीवियों में से कुछ साथियों द्वारा कुछ इस तरह के चित्र और पोस्टें डाली जा रही हैं, उन्हे देखकर लगता है कि गांधीजी व शास्त्री की परस्पर तुलना की जा रही है। एक को दूसरे से श्रेष्ठ बताने के इशारे किए जा रहे हैं। अंधअनुयाइयों की तरह प्रतिस्पर्धा चल रही है। मैं निःसंकोच कहना चाहता हूं कि इस प्रक्रिया में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से शास्त्रीजी की तुलनात्मक प्रसंशा कर उन्हे श्रेष्ठ साबित कर गांधीजी की आलोचना करने की कोशिश नजर आती है।

Gandhi-Shastri

इसमें कोई संदेह नहीं है कि शास्त्रीजी जैसे व्यक्ति इस धरती पर कम ही अवतरित होते हैं, उनकी ईमानदारी, निष्ठा, त्याग, बहादुरी, सादगी जैसे कई अनुकरणीय सद्गुणों के साथ वे हमारे आदर्श हैं। देश के लिए उनका योगदान अविस्मरणीय है, जो उनके प्राणों की आहुति तक भी है। यह भी संभव है कि व्यक्तिगत रूप से कोई व्यक्ति रूप से शास्त्रीजी या गांधीजी को दीवानगी की हद तक पसंद करता हो, अपने पसंदीदा व्यक्तित्व की प्रसंशा आप मनचाहे ढंग से कर सकते हैं, हमारे कानून में भी अभिव्यक्ति की आजादी है। पर यह ध्यान भी रखना चाहिए कि ये दोनों महापुरूष हमारी निजी संपत्ति नहीं, बल्कि वे पूरे राष्ट्र की संपदा हैं।

तुलना की बात गैर जरूरी इसलिए है कि दोनों के कार्यक्षेत्र अलग रहे हैं। शास्त्रीजी सरकार में रहकर बेहतर कार्य किया व गांधीजी ने सत्ता से दूर रहकर समाज के बीच कार्य किया। हालांकि गांधीजी और शास्त्रीजी में सादगी, ईमानदारी, जैसी काफी कुछ समानताएँ थीं। अलग-अलग स्थितियों में दोनों के कार्य अद्वितीय व महान हैं। पर उनके व्यक्तित्वों व देष-काल, परिस्थितियों में उनके द्वारा किए कार्यों को लेकर उनकी परस्पर तुलना करना बेमानी है।

गांधीजी का अधिकांश कार्य आजादी के पूर्व से लेकर आजादी के बाद तक का है। शास्त्री जी का व्यक्तित्व एक प्रधानमंत्री के रूप में अद्वितीय है। सादगी के संदर्भ में भी महात्मा जी के बारे में लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा ही है। त्याग ऐसा कि कोई पद धारण नहीं किया, वे चाहते तो आजादी के बाद क्या न बन सकते थे। यहां तक कि एक और दुर्लभ बात यह रही कि उन्होंने अपने किसी भी पुत्र या परिजन को राजनीति और सत्ता में स्थापित नहीं किया।

हमारे लिए तो विराट संयोग ही है कि राष्टपिता के साथ-साथ हम हमारे महान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी भी जयंती भी मना रहे हैं। हमें आज के दिन इनके आदर्षों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।दोनों में से किसी के सिद्धांत भी यह इजाजत नहीं देंगे कि लोग इनके अनुयायी इस तरह से बनकर बेवजह की प्रतिस्पर्धा में इनके नामों को घसीटें या तराजू पर तौलें। महापुरूष अतुलनीय होते हैं। उनकी तुलना किसी भी तरह उचित नहीं है।

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