आज़ादी के 65 साल: 5 गलतियां जिन्हें 50 साल बाद भी भुगत रहा है भारत

जवाहर लाल नेहरू। देश के पहले प्रधानमंत्री। आधुनिक भारत की बुनियाद रखने वाले नेता। ब्रिटेन में पढ़े-लिखे और नामी वकील मोतीलाल नेहरू के बेटे नेहरू ने देश की बागडोर बड़ी उम्मीदों के बीच संभाली थी। उन्होंने कई शानदार फैसले लेते हुए नाजुक वक्त पर देश को आगे बढ़ाने का काम किया था, जिनके लिए आज भी देश उनका एहसानमंद है। लेकिन नेहरू के कुछ फैसले देश को बहुत भारी पड़े।
Nehru
15 अगस्त, 2013 में कुछ घंटे ही बाकी हैं। इस मौके पर 1947 से 1964 तक 17 सालों तक देश के प्रधानमंत्री रहे नेहरू के समय की गईं उन पांच बड़ी गलतियों पर आगे की स्लाइड में नजर डालिए, जिनकी कीमत हम आज भी चुका रहे हैं।
1. कश्मीर के मुद्दे को यूएन में ले जाने का एलान
1947 में जब कबायलियों ने कश्मीर पर हमला किया तो भारत परेशान हो गया था। अक्टूबर, 1947 के आखिरी दिनों जब पाकिस्तान के कबायली श्रीनगर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर थे, तब दिल्ली में कैबिनेट की बैठक हुई थी। उस बैठक में सेना की ओर से कर्नल मानेक शॉ (मानेक शॉ बाद में फील्ड मार्शल बने) मौजूद थे। मानेक शॉ ने एक इंटरव्यू में दिल्ली में हुई कैबिनेट की उस बैठक के बारे में बताया, ‘हमेशा की तरह नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र, रूस, अफ्रीका, भगवान और अन्य कई तरह के मुद्दों पर बात की। लेकिन यह सब सुनकर सरदार पटेल ने अपना आपा खो दिया। पटेल बोले, ‘जवाहरलाल क्या आप कश्मीर चाहते हैं? या फिर आप उसे खो देना चाहते हैं? इस पर नेहरू बोले-बिल्कुल, मैं कश्मीर चाहता हूं। तब पटेल बोले, तो कृपया अपना आदेश दीजिए। इसके बाद पटेल ने नेहरू की बात सुने बिना मुझसे सेना की कार्रवाई आगे बढ़ाने को कहा।’ इसके बाद भारतीय सैनिक विमानों से श्रीनगर भेजे गए और कबायलियों को मुंहतोड़ जवाब दिया गया। लेकिन उन्हीं दिनों जिन्ना ने भारत के नेताओं को पाकिस्तान आकर बातचीत करने का न्योता दिया। इस पर चर्चा के लिए भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंट बेटेन, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल इकट्ठा हुए। बैठक में जिन्ना के न्योते पर पटेल ने आपत्ति जताई और पाकिस्तान न जाने की सलाह दी। लेकिन नेहरू और माउंट बेटेन जिन्ना के न्योते को लेकर नरम थे। बैठक में तय हुआ कि जिन्ना से बातचीत के लिए पाकिस्तान का दौरा होगा। लेकिन दौरे से ऐन पहले नेहरू की तबियत खराब हो गई। दौरे पर सिर्फ माउंट बेटेन गए। माउंट बेटेन पाकिस्तान गए और जिन्ना से बातचीत की। जब बातचीत चल ही रही थी, तभी अचानक नेहरू ने 2 नवंबर को आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम संदेश में एकतरफा एलान कर दिया कि वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाएंगे और भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या आज़ाद रहने पर फैसले के लिए कश्मीर के लोगों के बीच जनमत संग्रह कराया जाएगा। नेहरू के उस एलान की कीमत आज भी भारत चुका रहा है। तब से लेकर आज तक यह मुद्दा विवादों से घिरा रहा है और कश्मीर के लोगों के बीच जनमत संग्रह की मांग उठती रही है।
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2. हिंदू कोड बिल 
जवाहर लाल नेहरू ने पहला लोकसभा चुनाव जीतने के बाद हिंदू कोड बिल यह कहते हुए लागू किया कि इससे हिंदू समाज में सुधार आएगा। लेकिन उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने में असमर्थता जताई थी। हिंदू समाज को यह आपत्ति थी कि अगर सामाजिक सुधार की जरुरत है तो सिर्फ हिंदू समाज ही क्यों देश के सभी धर्मों के लोगों को इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन नेहरू ने कहा था कि पहले हिंदू समाज से इसकी शुरुआत होनी चाहिए और फिर अन्य धर्मों पर भी इसे लागू किया जाएगा। लेकिन आज तक भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं किया गया। ऐसी किसी भी कोशिश पर अन्य धर्म के लोग आपत्ति जताते हैं।
Jawahar Lal Nehru
3. तिब्बत पर चीन के हक को दी मंजूरी 
नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। वे चीन को खुश करने के लिए कई तरह के उपाय कर रहे थे। नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा दिया था, जिसमें भारत से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने को कहा गया था। इसकी जगह नेहरू ने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दे डाली थी। अगर नेहरू ने उस पेशकश को स्वीकार कर लिया होता तो कई दशकों पहले भारत सामरिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मजबूत देश के तौर पर उभर चुका होता।
जवाहर लाल नेहरू की चीन को लेकर दरियादिली का सिलसिला यहीं नहीं थमा। नेहरू ने 29 अप्रैल, 1954 को चीन के साथ पंचशील के सिद्धांत पर समझौता किया था। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था। नेहरू ने चीन से दोस्ती की खातिर तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के ‘कब्जे’ को मंजूरी दे दी। जानकार मानते हैं कि भारत के इस समझौते के बाद से ही हिमालय में भू-राजनैतिक हालात हमेशा के लिए बदल गए। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत में अपने विस्तार का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज भी जारी है। दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत में चीन के खिलाफ आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत में चीन के पांव पसारने का नतीजा यह हुआ है कि आज उसके हौसले बुलंद हैं और वह न सिर्फ गाहे ब गाहे वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर रहा है बल्कि अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता है। नेहरू की वह गलती भाज भारत पर बहुत भारी पड़ रही है।
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4. चीन ने भोंका पीठ में छुरा 
नेहरू शांति और समझौते के दम पर चीन के साथ सीमा विवादों को सुलझाना चाहते थे। उनकी मंशा पर किसी को शक नहीं था। लेकिन नेहरू चीन की शातिराना चालों को पढ़ने में नाकाम रहे। चीन के साथ विवादों को सुलझाने के लिए उन्होंने ‘पंचशील’ समझौते के तहत तिब्बत पर चीन के हक को मंजूरी भी दी थी। लेकिन नेहरू का चीन पर भरोसा भारत पर बहुत भारी पड़ा। 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया। आज़ादी के बाद भारत आज तक सिर्फ एक लड़ाई हारा है। यह वही जंग थी, जिसमें भारत को नीचा देखना पड़ा। नेहरू का हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा किसी काम न आया और चीन के साथ जंग में बड़ी संख्या में भारत ने अपने वीर सपूत खोए।
यही नहीं, उलटा चीन ने लड़ाई के लिए नेहरू को ही दोषी ठहराया। हेनरी किसिंजर ने चीन पर लिखी अपनी किताब में चीनी गणतंत्र के संस्थापक माओ त्से तुंग के हवाले से लिखा है, ‘हमने चियांग, जापान, अमेरिका के साथ जंग लड़ी। इनमें से किसी भी लड़ाई में हम नहीं हारे। हम इनमें से किसी से डरे भी नहीं। अब भारतीय हमसे लड़ना चाहते हैं। हमें डर नहीं है। हम जमीन नहीं दे सकते। एक बार हमने जमीन दे दी तो वे जमीन के बड़े हिस्से पर दावा करेंगे। चूंकि, नेहरू अड़े हुए हैं और वे हमसे जंग चाहते हैं तो उनसे न लड़ना दोस्ताना नहीं होगा।’
चीन आज भी नेहरू की ‘फॉरवर्ड’ पॉलिसी को 62 की जंग के लिए जिम्मेदार मानता है। चीन का कहना था कि भारत मैकमोहन रेखा को पार कर चीन को उकसा रहा था। लेकिन भारत का कहना है कि चीन ने जंग के लिए भारत को उकसाया था और वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया था, जिसके बाद जंग शुरू हुई थी।
पूर्व राजनयिक किशन एस राणा के मुताबिक, ‘चीन से मिले धोखे के बाद नेहरू ने अपनी जेब से माचिश निकाली और चीन के साथ राजनयिक स्तर पर हुए समझौतों के कागजों में आग लगा दी। इसके बाद वे बोले-अगर चीन अब कोई हमला न करे तो भी चीन से किसी सार्थक बातचीत करने में कम से कम सदी का एक चौथाई वक्त लगेगा।’ चीन के ‘धोखे’ का नेहरू पर इतना गहरा असर पड़ा था कि वे इस सदमे से उबर नहीं पाए थे। कई लोगों का मानना है कि वे चीन से जंग हारने के बाद अस्वस्थ रहने लगे थे।
चीन से संभावित खतरे को पटेल भांप चुके थे। अपने निधन से कुछ समय पहले 7 नवंबर, 1950 को उन्होंने नेहरू को चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी में उन्होंने भारत को पाकिस्तान के साथ-साथ चीन से भी होशियार रहने को कहा था। लेकिन नेहरू ने पटेल की आशंकाओं को हवा में उड़ा दिया।
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5. राज्यों का बंटवारा 
नेहरू ने भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट को तोड़कर आंध्र प्रदेश और बॉम्बे स्टेट को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात का निर्माण किया था। भाषायी आधार पर राज्यों का गठन एक बार शुरू हुआ तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। आज हालत यह है कि देश में दर्जन भर राज्यों में अलग सूबे के निर्माण की आग भड़की हुई है।
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One Response to आज़ादी के 65 साल: 5 गलतियां जिन्हें 50 साल बाद भी भुगत रहा है भारत

  1. CPMN, Communist Party Of Marxist New – National General Secretary-Dr.A.Ravindranath Kennedy is stated that,

    The Congress UPA Government is holding the anti people policy:-

    There is no doubt that, the capitalist policies of the ruling Congress UPA Government must not be allowed to continue in power. The unbridled corruption at higher echelons of the Congress –led UPA Government at the behest of corporate houses as manifest in the 2 G Spectrum Scam, the Commonwealth Games Scam, Godavari Basin Oil exploration Scam, Coal allotment Scam, Defense Helicopter Scam and improper implementation of Food Security Bill, Foreign Direct Investment Policy, Telangana issues e.t.c.,

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