निरर्थक शब्दों से सावधान

हमारी फिल्मों ने हमें दिल में चुभने वाले बहुत से ऐसे डायलॉग दिए, जो वास्तव में निरर्थक हैं। जैसे, ‘मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’ यह वाक्य जब भी बोला जाता है, तब डराने-धमकाने के लहजे में कहा जाता है। गुंडे-बदमाश ही नहीं, परिवार तक में लोग यह धमकी देते हैं। इस डॉयलाग के बाद दूसरा व्यक्ति कभी पलटकर नहीं पूछता कि आपका क्या मतलब है? क्या आपने दुनिया के हर व्यक्ति की बुराई की हदें देख ली हैं? क्या आप जानते हैं कि बुरा से बुरा आदमी क्या कर सकता है? अगर आप मानते हैं कि आप सबसे अधिक बुरे हैं, तो आप मेरा क्या कर लेंगे? लेकिन सुनने वाला कुछ पूछने की बजाय धमकी सुनकर सहम जाता है।

ऐसा ही एक निरर्थक आश्वासन है, ‘मैं आपका एहसान जिंदगी भर नहीं भूल सकता। या भूल सकती।’ क्या इतना कहने भर से किसी का एहसान चुकाया जा सकता है? और एहसान न भूलने से दूसरे आदमी का क्या फायदा होने वाला है? क्या इसके न भूलने से अगले की समस्याएं हल हो जाएंगी? सबसे खतरनाक डायलॉग है, ‘आंखें खोलो।’ इस पर तो कानूनन रोक लगानी चाहिए, क्योंकि फिल्मों में यह डायलॉग ऐसे समय कहा जाता है, जब कोई गंभीर रूप से घायल होता है या किसी को दौरा पड़ गया है या गोली लगी है, तो आसपास जो भी लोग होते हैं, वे बारी-बारी से कहते हैं, ‘आंखें खोलो, आंखें खोलो।’ सभी को यह कहने का चांस दिया जाता है। उधर घायल आदमी संकट में है और लोग उसकी आंखें खुलवा रहे हैं!

हमारी जिंदगी फिल्म नहीं है, लेकिन नोट कीजिए, तो सुबह से शाम तक हम भी न जाने कितनी ऐसी बातें कहते हैं, जो निर्थक हैं। दिक्कत यह है कि ऐसी ही निर्थक बातों से हम अपनी जिंदगी में रंग भरना चाहते हैं, जबकि जिंदगी में कोई अर्थ तभी रंग भरता है, जब हम निर्थक बातों और चीजों को उससे बाहर कर देते हैं।

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Auraiya - A City of Greenland.
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