गरीबी के आंकड़ों में छिपी पहेलियां

योजना आयोग ने गरीबी का आकलन करने के लिए जिस बेहूदे ढंग से उसका पैमाना बनाया है, उसकी खासी आलोचना हो रही है। यह तय है कि इसमें और कुछ नहीं गरीबी को कम दिखाने का एक राजनीतिक खेल है। लेकिन योजनविदों का कहना है कि अगर हम गरीबी की रेखा को कुछ ऊंचा भी कर देते तो भी गरीबी में कमी का हमें ऐसा ही रुझान दिखाई देता। तेंदुलकर समिति ने गरीबी रेखा का जो पैमाना तैयार किया था उसके आधार पर देखें तो 2004-05 से 2011-12 तक गरीबों का तादाद 37.2 फीसदी के घटकर 21.9 फीसदी रह गई है। लेकिन अगर इसी तरीके को अपनाएं तो 1993-94 से 2004-05 के बीच गरीबी बहुत कम घटी, वह बस 45.3 फीसदी से कम होकर 37.2 फीसदी पर आ गई। गरीबी के इतनी तेजी से गिरने का कारण आसानी से बताया जा सकता है कि इस दौरान विकास दर काफी तेज थी, खासकर 2004-05 से लेकर 2007-08 के आर्थिक तेजी वाले दौर में। लेकिन सबसे दिलचस्प है इसके बाद के दो वर्षों में गरीबों के अनुपात का तेजी से गिरना। इस दौरान गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी घटकर 29.8 फीसदी हो गई। यानी दो  साल में 7.9 फीसदी की तेज गिरावट। जबकि इसके पहले के पांच साल में कुल गिरावट 7.4 फीसदी की थी। इन दो साल में गरीबों की संख्या इतनी तेजी से क्यों नीचे आई?

क्या इसका कारण हैं सामाजिक कल्याण के कार्यक्रम? इसके लिए हम सबसे पहले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी मनरेगा को देखते हैं। यह सरकार का सबसे बड़ा कल्याण कार्यक्रम है। अगर खुद सरकार के ही आंकड़ों को देखें तो सचाई कुछ अलग दिखती है। इन आंकड़ों के हिसाब से मनरेगा के तहत रोजगार दिवस कम हुए हैं। 2009-10 में इसके तहत 28.3 लाख रोजगार दिवस थे जो 2011-12 में घटकर 21.6 लाख हो गए। इस हिसाब से देखें तो इस योजना से गरीबी इतनी तेजी से नहीं घट सकती। एक दूसरा कारण हो सकता है कि इस दौरान देश में रोजगार का सृजन। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के हिसाब से 2004 से 2009 तक का समय रोजगार हीन विकास का दौर था। लेकिन अगले दो साल में यह रुझान एकदम पलट गया। ताजा आंकड़ें बताते हैं कि 2009 से 2011 के दौरान देश में 139 लाख रोजगार के अवसर पैदा हुए। जबकि इसके पहले के पांच साल में रोजगार के  कुल 11 लाख अवसर पैदा हुए थे। रोजगार के अवसर पैदा होने का एक कारण यह हो सकता है कि इस दौरान निर्यात काफी तेजी से बढ़ा। श्रम प्रधान निर्यात से ज्यादा रोजगार पैदा होते ही हैं। एक कारण यह भी हो सकता है कि इन दो साल के दौरान कृषि विकास दर काफी तेजी से बढ़ी।

इस दौरान औसत कृषि विकास दर 6.4 फीसदी रही जो इसके पहले के पांच साल में औसतन 3.2 फीसदी रही थी। यह हो सकता है कि इसकी वजह से इस दौरान गरीबों की वास्तविक आमदनी बढ़ी हो। यह भी हो सकता है कि ज्यादा कृषि विकास दर और इसके साथ ही ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होने के कारण गरीबों की संख्या में कमी आई हो। लेकिन गौर से देखने पर गरीबी घटने के ये आंकड़े भी दुरुस्त नहीं लगते। मसलन बिहार का ही उदाहरण लें। यहां 2009-10 में गरीबों की तादाद 53.5 फीसदी थी जो 2011-12 में घटकर 33.74 फीसदी हो गई। सीधे सीधे 19.76 फीसदी की कमी। बिहार में 1993-94 से 2009-10 के बीच गरीबी में सिर्फ सात फीसदी की कमी आई थी, लेकिन इसके अगले दो साल में जो कमी आई उतनी किसी और राज्य में नहीं दिखाई दी। क्या यह प्रशासनिक बेहतरी का नतीजा है? लेकिन इसी बिहार में 2004-05 से 2009-10 के बीच गरीबी में बहुत मामूली सी कमी आई थी। वह 54.4 फीसदी से घटकर 53.5 फीसदी पर आ गई। जबकि इन दोनों ही दौर में बिहार में एक ही सरकार थी।

फिर ऐसा क्या जादू हुआ कि अगले दो साल में गरीबी बहुत तेजी से घटकर नीचे आ गई? यह सच है कि इस दौरान बिहार की प्रति व्यक्ति आय में खास इजाफा हुआ है। जिस समय प्रति व्यक्ति आय की राष्ट्रीय वृद्धि दर 6.5 फीसदी थी उस समय बिहार में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि 10.6 फीसदी हुई। लेकिन क्या महज दो साल की समृद्धि से गरीबी में इतना बड़ा फर्क लाया जा सकता है? इस दौरान महाराष्ट्र में प्रति व्यक्ति आय में 9.5 फीसदी की वृद्धि हुई, लेकिन वहां गरीबी में कमीं बिहार के मुकाबले काफी कम दर से आई- महज 7.15 फीसदी। यह ठीक है कि बिहार अपनी विकास दर के लिए कृषि और श्रम बहुल निर्माण कार्य पर बहुत निर्भर है, लेकिन उसकी यह निर्भरता तो उसके पहले के पांच साल में भी थी।

यहां पर हमें छत्तीसगढ़ के उदाहरण पर भी विचार करना चाहिए। जहां 1993-94 से 2009-10 के दौरान गरीबी 50.9 फीसदी से मामूली से घटकर 48.7 फीसदी पर आ गई। लेकिन अगले दो साल में यह बहुत तेजी से घटी और 39.9 पर आई गई। इस दौरान न तो छत्तीसगढ़ में सरकार बदली और न ही वहां प्रति व्यक्ति आय में कोई खास वृद्धि रिकॉर्ड की गई। पूर्वोत्तर भारत को हम आर्थिक और राजनैतिक रूप से तो नजरंदाज करते ही हैं, उसे हम आंकड़ों के मामले में भी नजरंदाज कर देते हैं। खासतौर पर आंकड़ों के संग्रह के मामले में। क्या यह सही है कि मिजोरम में तेंदुलर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, 1993-94 में गरीबों की संख्या 11.8 फीसदी थी जो 2011-12 में बढ़कर 20.4 फीसदी हो गई। क्या यह सच है? अरुणाचल का मामला तो और भी अजीब है। यहां गरीबी 2004-05 में 31.4 फीसदी थी, 2009-10 में यह 25.9 फीसदी हो गई, तो 2011-12 में यह फिर से बढ़ी और 34.67 फीसदी पर जा पहुंची।

क्या नगालैंड भी विकास के अजीबो-गरीब रुझान पर चल रहा है? वहां 1993-94 में गरीबों की संख्या 20.4 फीसदी थी, जो 2004-05 तक तेजी से घटती हुई 8.8 फीसदी पर पहुंच गई, लेकिन 2011-12 में यह फिर से बढ़कर 18.88 फीसदी पर जा पहुंची। और फिर मणिपुर में गरीबों की संख्या तेजी से घट बढ़ क्यों रही है? 1993-94 में यह 65.1 फीसदी थी जो 2004-05 में घटकर 37.9 फीसदी पर जा पहुंची। यह फिर बढ़ी और 2009-10 में 47.1 फीसदी हो गई। इसके बाद यह गिरी और 2011-12 में 36.89 फीसदी पहुंच गई। अगर हमारे योजनविद यह चाहते हैं कि हम उनके आंकड़ों को गंभीरता से लें तो उन्हें इन आंकड़ों में छुपी पहेलियों की व्याख्या करनी होगी।

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