अपना दोष स्वीकारें

गलती स्वाभाविक है, वह सबसे होती है। लेकिन 99 प्रतिशत मामलों में कोई अपनी गलती नहीं मानता, चाहे उससे कितनी ही भारी भूल क्यों न हुई हो। बावजूद इसके कि भूल को स्वीकारने में हानि कुछ भी नहीं है। इससे अपना मन निर्मल हो जाता है और आगे के लिए सब कुछ ठीक। लेकिन जब गलती को गलती मानकर स्वीकार नहीं किया जाता, तो हमारा दुस्साहस बढ़ता जाता है और हमें कई बार हमें करने में ही आनंद आने लगता है। छिपाई हुई भूल भी अनेक अनर्थो को जन्म देती है। सच और गलती से उतना विषैला वातावरण नहीं बनता, जितना उसे छिपाने से बनता है। अपनी गलती स्वीकारने का अर्थ है सच्चाई के प्रति प्रेम। सच्चाई हमारे बाहरी, आंतरिक विकास की सबसे बड़ी जरूरत है। सच्चाई न हो, तो हमारा एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता। सच्चाई प्रथम आवश्यक वस्तु है, उसका परित्याग कर देने से हम डरे-डरे से रहते हैं। झूठ में हृदय कांपता है। चारों ओर से कोई न कोई उंगली उठाता जान पड़ता है। हर संकेत पर, प्रत्येक इशारे पर यही संशय होता है कि वह हमारी बुराई कर रहा है, चाहे वहां बात किसी अन्य व्यक्ति की चल रही हो। निर्भीकता सच्चाई में होती है। जब हमें सच बोलने का आभास होगा, तो हम भला किसी की निंदा से क्यों घबराएंगे?

महान दार्शनिक सुकरात अक्सर कहा करते थे, ‘जो अपने आप को व्यक्त कर सकता है, उसे मैं सबसे बड़ा साहसी मानता हूं। मुझे विश्वास हो जाता है कि वह एक दिन जरूर अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लेगा, क्योंकि अब उसका हृदय साफ हो गया है।’ सद्गुण हमारे जीवन की प्रमुख आवश्यकता है। इससे हमारे सुखों में वृद्धि होती है। समाज में व्यवस्था रहती है और सर्वत्र सुखद वातावरण का निर्माण होता है। अपनी गलती स्वीकारने वाले सद्गुणी मनुष्य के लिए इस संसार में कोई अभाव नहीं है।

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